आईना

तेरे चेहरे कि शिकन बर्दाश्त न होती
तुझे खुश रखने में मुझही को बदलती।

एक दिन हुआ आईने  से सामना मेरा
पहचान न पायी वह कौन था खड़ा

सूखे बाल, लाल आखें, होंठ फटे
साफ़ बयां कर रहे थे पिछले दिन जो कटे

गौर से देखकर मैंने पूछा उसका नाम
‘रेवती ‘ कहते ही हुई उसकी आँखें नम।

नाम भी शायद उसी ने होगा दिया
शक्ल, हस्ती और बोली वह सब बदल गया।

अपने आप को बदल कर क्या तूने पाया
आक्रोश, डर और अफ़सोस ही दिल में समाया।

लौट आ अभी भी वक़्त है
दिल कि लौ अभी भी तेज़ है।

मत मिटा अपने मन का विश्वास
हाँ, अभी भी है तू ख़ास।

शायद वो था नहीं तेरा हमसफ़र
साथ न चल पाते दोनों रहगुज़र।

ले किस्मत को हथेली पर और भर दे गुलाल
वादा है खुद से न रहेगा कोई मलाल।
 

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